रायपुर। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर विवेकानंद नगर स्थित श्री संभवनाथ जिनालय में दादा गुरुदेव की विशेष पूजा-अर्चना हुई। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में नमन कर श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजन किया। श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चल रही चातुर्मासिक प्रवचनमाला में परम पूज्य मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. ने गुरु महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जीवन में अहंकार का विसर्जन और शिष्यत्व का विकास ही आत्मकल्याण का प्रथम सोपान है।
मुनिश्री ने कहा कि गुरु भगवंतों का सबसे बड़ा उपकार यह है कि उन्होंने जिनशासन को हम तक पहुंचाया। जिनशासन में गुरु ही साधक का मार्गदर्शन कर उसे उच्च आध्यात्मिक पदों तक पहुंचाते हैं। जैसे किसी रोग का उपचार केवल चिकित्सक ही कर सकता है, उसी प्रकार मोक्ष प्राप्ति के लिए गुरु का सानिध्य आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि जो व्यक्ति गुरु के चरणों में स्वयं को समर्पित कर देता है, वह चिंता से मुक्त हो जाता है। देव, गुरु और धर्म जिनके जीवन में होते हैं, उनके जीवन की चिंताएं समाप्त हो जाती हैं। शास्त्रकार भगवंतों ने भी गुरु पूर्णिमा को शिष्यत्व जागृत करने और आत्मोद्धार की दिशा में पहला कदम बताया गया है।
मुनिश्री ने कहा कि पहले सच्चा शिष्य बनना आवश्यक है। यदि शिष्य बनने के बाद भी व्यक्ति अपने अहंकार का त्याग नहीं करता, तो वह मोक्ष मार्ग से विमुख हो जाता है। जिसने अहंकार का परित्याग कर दिया, उसे गुरु के हृदय में स्थान मिलता है और जिसे गुरु की कृपा प्राप्त हो जाए, उसे मोक्ष प्राप्ति से तीनों कालों में कोई नहीं रोक सकता।
मुनिश्री ने कहा कि जीवन संघर्ष भी है, यात्रा भी है और उत्सव भी। जिसके जीवन में गुरु नहीं हैं, उसका जीवन केवल संघर्ष है। जिसके जीवन में गुरु हैं, उसका जीवन साधना की यात्रा है। और जो गुरु चरणों में अहंकार का विसर्जन कर देता है, उसका जीवन उत्सव बन जाता है।














