मुन्ना अन्सारी सम्पादक एम आर जे न्यूज महराजगंज
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सितंबर विषुव , 23 सितंबर 2026 को सुबह 5:35 बजे IST पर घटित होगा। इस समय सूर्य आकाशीय विषुवत् रेखा को उत्तर से दक्षिण पार करेगा, जिससे उत्तरी गोलार्ध में खगोलीय शरद और दक्षिणी गोलार्ध में खगोलीय वसंत शुरू होगा साथ ही इस दिन, दिन-रात लगभग बराबर रहेंगे और सूर्य ठीक पूर्व में उगेगा और ठीक पश्चिम में अस्त होगा। इस बारे में खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए 10 अति महत्वपूर्ण बिंदुओं में विषुव की सम्पूर्ण जानकारी को समाहित करते हुए समायोचित जानकारी दी है जो इस प्रकार हैं।
1. विषुव क्या है?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सितंबर विषुव पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर वार्षिक परिक्रमा में आने वाला महत्वपूर्ण खगोलीय पड़ाव है और विषुव उस क्षण को कहते हैं, जब सूर्य का आभासी मार्ग आकाशीय विषुवत् रेखा को पार करता है। आकाशीय विषुवत् रेखा पृथ्वी की भूमध्य रेखा का आकाश में बना हुआ काल्पनिक विस्तार है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोलीय भाषा में विषुव वे दो बिंदु हैं, जहां क्रांतिवृत्त यानी सूर्य का आभासी वार्षिक मार्ग और आकाशीय विषुवत् रेखा एक-दूसरे को काटते हैं, लेकिन पृथ्वी से देखने पर सितंबर विषुव के समय सूर्य उत्तर से दक्षिण की ओर जाते हुए आकाशीय विषुवत् रेखा को पार करता दिखाई देता है, इसी कारण उत्तरी गोलार्ध में खगोलीय शरद ऋतु और दक्षिणी गोलार्ध में खगोलीय वसंत ऋतु शुरू होती है।
2. सितंबर विषुव 2026 की तिथि और समय क्या है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि वर्ष 2026 का सितंबर विषुव 23 सितंबर को होगा और इसका सटीक क्षण 00:05 UTC है, जो भारतीय समयानुसार 23 सितंबर को सुबह 5:35 बजे होगा और यह भी जानना आवश्यक है कि विषुव किसी पूरे दिन चलने वाली कोई अलग खगोलीय घटना नहीं, बल्कि पृथ्वी-सूर्य प्रणाली में घटित होने वाला एक निश्चित क्षण होता है अगर हम बात करें भारत की तो पाते हैं कि भारत सहित उत्तरी गोलार्ध के देशों में इसे शरद विषुव या शरद संपात कहा जाता है और दक्षिणी गोलार्ध में यही घटना वसंत विषुव कहलाती है। सितंबर विषुव सामान्यतः 22 या 23 सितंबर को आता है, हालांकि पृथ्वी की कक्षीय अवधि और कैलेंडर-वर्ष के अंतर के कारण कुछ वर्षों में यह 21 या 24 सितंबर को भी पड़ सकता है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि वर्ष 2026 में मार्च विषुव 20 मार्च को हुआ, जबकि सितंबर विषुव 23 सितंबर 2026 को होगा, और मार्च विषुव, उत्तरी गोलार्ध में खगोलीय वसंत और सितंबर विषुव, खगोलीय शरद ऋतु की शुरुआत का संकेत देता है।
3. क्या सच में दिन और रात बराबर होते हैं।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि “Equinox” शब्द लैटिन के aequus यानी समान और nox यानी रात से बना है। जिसका मतलब/अर्थ ही होता है, समान रात, विषुव के समय पृथ्वी के अधिकांश हिस्सों में दिन और रात की अवधि लगभग बराबर होती है, लेकिन यह कहना सही नहीं है कि हर स्थान पर ठीक 12 घंटे दिन और 12 घंटे रात होती है, क्योंकि इसके दो मुख्य कारण हैं,पहला कारण होता है कि सूर्य,आकाश में एक बिंदु नहीं, बल्कि लगभग आधा डिग्री व्यास वाला गोलाकार डिस्क है,सूर्योदय का समय सूर्य के ऊपरी किनारे के क्षितिज को छूने पर और सूर्यास्त का समय उसके ऊपरी किनारे के पूरी तरह गायब होने पर निर्धारित किया जाता है। और दूसरा कारण होता है कि पृथ्वी का वायुमंडल सूर्य के प्रकाश को मोड़ता है,इस वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण सूर्य वास्तविक ज्यामितीय स्थिति में क्षितिज के नीचे होने पर भी कुछ समय दिखाई देता है, इससे सूर्योदय थोड़ा पहले और सूर्यास्त थोड़ा बाद में दिखाई देता है,परिणामस्वरूप विषुव के दिन अधिकांश स्थानों पर दिन की अवधि रात से कुछ मिनट अधिक रहती है। जिस दिन किसी विशेष स्थान पर दिन और रात की अवधि वास्तव में लगभग बराबर होती है, उसे इक्विलक्स या समप्रकाश दिवस कहा जाता है एवं इसकी तिथि अक्षांश और स्थानीय क्षितिज की परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग एवं बदलती है और यह विषुव से कुछ दिन पहले या बाद में हो सकती है।
4. सूर्य ठीक पूर्व में उगेगा और ठीक पश्चिम में अस्त होगा इसका विषुव में क्या मतलब है।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सितंबर विषुव की प्रमुख विशेषता यह है कि इस दिन सूर्य लगभग ठीक पूर्व दिशा में उगता और लगभग ठीक पश्चिम दिशा में अस्त होता है,क्योंकि विषुव के समय सूर्य, आकाशीय विषुवत् रेखा पर होता है और पृथ्वी के घूर्णन के कारण उसका उदय पूर्व और अस्त पश्चिम दिशा के निकट दिखाई देता है, हालांकि, “ठीक पूर्व” और “ठीक पश्चिम” का व्यावहारिक अवलोकन स्थानीय भू-दृश्य, क्षितिज, पहाड़, इमारतों और सूर्योदय-सूर्यास्त की परिभाषा से थोड़ा प्रभावित हो सकता है, लेकिन उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर स्थिति अलग होती है,वहां सूर्य, क्षितिज के चारों ओर घूमता दिखाई दे सकता है और सामान्य अर्थों में सूर्योदय तथा सूर्यास्त अन्य स्थानों जैसा स्पष्ट नहीं होता, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विषुव के दिन विद्यार्थी और आम लोग किसी खुले स्थान पर सूर्योदय और सूर्यास्त की दिशा भी चिह्नित कर इस घटना का सरल अवलोकन कर सकते हैं।
5. ऋतु परिवर्तन का वैज्ञानिक कारण क्या है।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी की घूर्णन धुरी उसके कक्षीय तल के लंबवत से लगभग 23.5 डिग्री झुकी हुई है और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते समय इसी झुकाव के साथ आगे भी बढ़ती है, इसीलिए वर्ष के अलग-अलग समय पर कभी उत्तरी गोलार्ध, सूर्य की ओर झुका होता है और कभी दक्षिणी गोलार्ध, लेकिन सितंबर विषुव के समय कोई भी गोलार्ध सूर्य की ओर या उससे दूर प्रमुख रूप से झुका नहीं होता, इसीलिए सूर्य का प्रकाश दोनों गोलार्धों में अपेक्षाकृत संतुलित ढंग से वितरित होता है,इसके बाद उत्तरी गोलार्ध सूर्य से धीरे-धीरे दूर की ओर झुकने लगता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध सूर्य की ओर झुकता जाता है,इसी कारण सितंबर विषुव के बाद उत्तरी गोलार्ध में दिन छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं और दक्षिणी गोलार्ध में इसके विपरीत दिन लंबे और रातें छोटी होती जाती हैं,और ऋतुओं का मूल कारण पृथ्वी की सूर्य से दूरी नहीं, बल्कि पृथ्वी की धुरी का झुकाव और सूर्य के चारों ओर उसकी परिक्रमा है।
6. शरद ऋतु की खगोलीय और मौसम-विज्ञानी परिभाषा क्या हैं।?
वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस पर संक्षिप्त खगोलीय प्रकाश डालते हुए बताया कि शरद ऋतु की शुरुआत को दो तरीकों से परिभाषित किया जाता है, पहला होता है खगोलीय दृष्टि,खगोलीय दृष्टि से उत्तरी गोलार्ध में शरद ऋतु सितंबर विषुव से शुरू होती है और दिसंबर संक्रांति तक रहती है और साथ ही अगर हम बात करें मौसम-विज्ञान में, तो पाते हैं कि मौसम-विज्ञान में वर्ष को तीन-तीन महीनों की निश्चित ऋतुओं में बांटा जाता है,इस पद्धति के अनुसार शरद ऋतु 1 सितंबर से 30 नवंबर तक मानी जाती है, इसका उद्देश्य विभिन्न वर्षों के तापमान, वर्षा और जलवायु आंकड़ों की तुलना को सरल बनाना होता है,इसलिए 1 सितंबर से शुरू होने वाली शरद ऋतु मौसम-विज्ञान की परिभाषा है, जबकि 23 सितंबर से शुरू होने वाली शरद ऋतु खगोलीय परिभाषा पर आधारित है।
7. चार प्रमुख मौसमी खगोलीय पड़ाव क्या होते हैं।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि एक वर्ष के मौसमी चक्र में चार प्रमुख खगोलीय पड़ाव होते हैं जोकि इस प्रकार परिभाषित किए जाते हैं, मार्च विषुव, जून संक्रांति, सितंबर विषुव और दिसंबर संक्रांति। विषुव के समय सूर्य आकाशीय विषुवत् रेखा पर होता है, जबकि संक्रांति के समय सूर्य आकाशीय विषुवत् रेखा के उत्तर या दक्षिण में अपनी सबसे दूर की आभासी स्थिति पर पहुंचता है,जून संक्रांति उत्तरी गोलार्ध में खगोलीय ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत का संकेत देती है,उस समय उत्तरी ध्रुव, सूर्य की ओर झुका होता है और सूर्य की सीधी किरणें कर्क रेखा के आसपास पड़ती हैं और दिसंबर संक्रांति उत्तरी गोलार्ध में खगोलीय शीत ऋतु की शुरुआत दर्शाती है, उस समय दक्षिणी ध्रुव, सूर्य की ओर झुका होता है और सूर्य की सीधी किरणें मकर रेखा के आसपास पड़ती हैं, खगोलविद अमर पाल सिंह ने स्पष्ट करते हुए बताया कि विषुवों के विपरीत, संक्रांतियां संबंधित गोलार्ध में वर्ष के सबसे लंबे या सबसे छोटे दिन से जुड़ी होती हैं।
8. विषुव का अवलोकन कैसे करें?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि विषुव के लिए किसी विशेष दूरबीन आदि की कोई भी आवश्यकता नहीं है, आप सूर्योदय और सूर्यास्त की दिशा पर ध्यान देकर सूर्य के लगभग पूर्व से उदय और पश्चिम में अस्त होने को देख सकते हैं, साथ ही खुले स्थान पर किसी खंभे, डंडे या छड़ी की छाया को दिनभर चिह्नित करना भी उपयोगी गतिविधि में सम्मिलित हो सकता है, इससे सूर्य की आभासी गति, पृथ्वी का घूर्णन और छाया की दिशा में होने वाले परिवर्तन को बड़े ही आसानी से समझा जा सकता है, खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष जोर देते हुए बताया है कि तेज रोशनी के दौरान तो सूर्य को सीधे नंगी आंखों से कभी नहीं देखना चाहिए क्योंकि इससे आंखों की रेटिना को स्थायी क्षति हो सकती है, सूर्य का अवलोकन केवल अंतर्राष्ट्रीय या आई ० एस० ओ० प्रमाणित सौर फिल्टर, सुरक्षित सोलर व्यूअर या पिनहोल प्रोजेक्टर से करें, सामान्य धूप के चश्मे, एक्स-रे फिल्म, काली कांच की प्लेट या बिना प्रमाणित फिल्टर वाली दूरबीन सुरक्षित नहीं होती हैं,दूरबीन में सौर फिल्टर हमेशा उसके आगे वाले सिरे पर लगाया जाना चाहिए, आंख के पास नहीं।
9. क्रांतिवृत्त, राशिचक्र और विषुव बिंदु क्या होते हैं।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष खगोलीय जानकारियों को सम्मिलित करते हुए समायोचित रूप में बताया कि सूर्य तारों की पृष्ठभूमि के सामने वर्षभर जिस आभासी मार्ग पर चलता दिखाई देता है, उसे क्रांतिवृत्त या रविपथ कहा जाता है और पृथ्वी की धुरी के झुकाव के कारण क्रांतिवृत्त और आकाशीय विषुवत् रेखा के बीच लगभग 23.5 डिग्री का कोण बनता है, लेकिन चंद्रमा और अधिकांश ग्रह क्रांतिवृत्त की ठीक उसी रेखा पर नहीं चलते, बल्कि उसके आसपास के एक पट्टे में दिखाई देते हैं, इस पट्टे को राशिचक्र ( जोडियाक) कहा जाता है, लेकिन बौने ग्रह प्लूटो का कक्षीय झुकाव अधिक होने के कारण उसका मार्ग इस सामान्य पट्टी से अलग है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विषुव बिंदु हमेशा हमेशा के लिए स्थिर नहीं बने रहते हैं बल्कि पृथ्वी की धुरी की दीर्घकालिक डगमगाहट जिसे अयन चलन कहा जाता है या कुछ यूं कहें कि अयन-चलन या विषुवों का पूर्वगमन कहा जाता है,इसके कारण विषुव बिंदु, तारों की पृष्ठभूमि के सापेक्ष धीरे-धीरे पश्चिम की ओर खिसकते हैं इस दीर्घकालिक अयन चलन के कारण पृथ्वी की धुरी को एक पूरा चक्र पूरा करने में लगभग 26,000 वर्ष लगते हैं, इसीलिए पृथ्वी की इस दीर्घकालिक अयन चलन गति के कारण, पृथ्वी से देखने पर ध्रुव तारे तक की स्थिति लगभग 26,000 बर्षों में अपने स्थान से बदल जाती है, इसीलिए यह भी समझना चाहिए कि यहाँ दीर्घकालिक ब्रह्मांडीय लय में कुछ भी स्थिर जैसा है ही नहीं।
10. भारतीय खगोल-परंपरा और इसका सांस्कृतिक महत्व क्या है।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि प्राचीन भारतीय खगोल-विज्ञान में सूर्य की गति, अयन, नक्षत्र और ऋतु-चक्र का गहरा अध्ययन किया गया है, प्राचीन कालीन भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नक्षत्र शब्द का उपयोग तारों या तारक-समूहों के लिए भी होता है और चंद्रमा के आकाशीय मार्ग को 27 भागों में बांटने के लिए भी होता है, जैसा कि हम जानते हैं कि चंद्रमा, तारों की पृष्ठभूमि के सापेक्ष लगभग 27.3 दिनों में एक चक्र पूरा करता है,इसलिए प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में चंद्र-पथ को 27 नक्षत्रों में विभाजित किया गया है, लेकिन साथ ही यह भी जानना आवश्यक है कि अयन-चलन के कारण विषुव बिंदुओं और नक्षत्रों का आपसी स्थान लंबे समय में बदलता रहता है, इसी वजह से अलग-अलग ऐतिहासिक काल में कृत्तिका, धनिष्ठा, श्रवण, चित्रा और रेवती जैसे नक्षत्रों को वर्ष या नक्षत्र-क्रम की शुरुआत से जोड़ा गया था और प्राचीन भारतीय ग्रंथों में अयन और ऋतु-परिवर्तन से जुड़े उल्लेख इस बात का संकेत भी देते हैं कि आकाशीय घटनाओं का समय, कृषि और पंचांग-निर्माण के लिए सावधानी से देखा जाता था और आधुनिक खगोलविद एवं इतिहासकार इन उल्लेखों की विशेष व्याख्या करते समय अयन-चलन और प्राचीन गणनाओं को भी ध्यान में रखते हैं, साथ ही विभिन्न सभ्यताओं ने विषुव को अपने-अपने सांस्कृतिक ढंग से समझा जैसे कि मिस्र में कई मंदिरों और स्थापत्य संरचनाओं का संबंध सौर दिशाओं और आकाशीय घटनाओं से रहा है एवं मेक्सिको के चिचेन इत्ज़ा स्थित कुकुलकान पिरामिड पर विषुव के आसपास बनने वाली प्रकाश-छाया की आकृति सांप जैसी दिखाई देती है, हालांकि इस प्रभाव की मूल मंशा को लेकर पुरातत्वविदों में पूरी सहमति नहीं भी हो सकती है।
लेकिन अगर हम बात करें सितंबर विषुव 2026 की तो पाते हैं कि इसका इसलिए विशेष महत्वपूर्ण है कि यह केवल दिन और रात के लगभग बराबर होने की घटना नहीं, बल्कि पृथ्वी की धुरी, सूर्य की आभासी गति, ऋतु-चक्र, नक्षत्र-पद्धति, अयन-चलन और मानव सभ्यता के आकाश-अवलोकन को जोड़ने वाला वैज्ञानिक पड़ाव है, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 23 सितंबर 2026 की सुबह होने वाला यह विषुव हमें निश्चित तौर पर यह खगोलीय याद दिलाएगा कि पृथ्वी का झुकाव और उसकी सूर्य के चारों ओर गति हमारे मौसम, कृषि, दिन के उजाले और जीवन की लय को लगातार प्रभावित करते हैं,इसीलिए समस्त खगोल प्रेमियों को इसका अवलोकन एवं सटीक प्रमाणित वैज्ञानिक एवं गणितीय और विशेष खगोलीय जानकारियों से ओत प्रोत होना ही चाहिए।
🙏🙏सादर।🙏🙏
धन्यवाद।
नोट – किन्हीं भी विशेष खगोलीय जानकारियों हेतु निःशुल्क 24×7 संपर्क सूत्र।
खगोलविद अमर पाल सिंह।
एस्ट्रोनॉमी एजुकेटर वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला, (तारामण्डल) गोरखपुर उत्तर प्रदेश भारत।
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