माया कषाय मन की शांति छीनने के साथ अध्यात्म से दूर करता है : मुनिश्री संवेगरत्न सागर

Ramesh Pandey
18 hours ago
Published On:

Follow Us

रायपुर। विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. ने माया कषाय के दुष्प्रभावों से सावधान किया। आचार्य वीरभद्राचार्य रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से मुनिश्री ने माया ध्यान से मुक्त होकर सरलता और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।

धर्मसभा में गुरुवार को मुनिश्री ने कहा कि माया की पर्याय छल, कपट और प्रपंच है। व्यक्ति इन प्रवृत्तियों में उलझकर अपने जीवन को कठिन बना लेता है। देव, गुरु और धर्म का मिलना सौभाग्य है, लेकिन इसके बाद भी यदि व्यक्ति सद्मार्ग को नहीं समझता और उस पर नहीं चलता तो मोक्ष का मार्ग दूर होता चला जाता है।

मुनिश्री ने कहा कि जिसने जीवन से शॉर्टकट की प्रवृत्ति नहीं छोड़ी, वह सरलता के मार्ग पर नहीं चल सकता। आज यह धारणा बन गई है कि जो व्यक्ति सीधा और सरल जीवन जीता है, उसे दुनिया जीने नहीं देगी। जबकि जीवन स्वभाव से सरल है। माया ध्यान में उलझकर मनुष्य स्वयं अपने जीवन को जटिल बना लेता है। माया कषाय व्यक्ति की सहजता और सरलता पर लगातार आघात करता रहता है।

मुनिश्री ने कहा कि माया ध्यान में उलझा व्यक्ति अपनी गलतियों को स्वीकार करने से बचता है। ऐसे में न सच्ची आत्म आलोचना हो पाती है और न ही वास्तविक प्रायश्चित। आत्मशुद्धि के लिए सच्ची आलोचना और सच्चा प्रायश्चित आवश्यक है। जिसका चारित्र्य विशुद्ध होता है, उसके लिए मुक्ति और मोक्ष का मार्ग खुलता जाता है।

मुनिश्री ने कहा कि माया ध्यान जीवन में आग लगाने का काम करता है। यह व्यक्ति के सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने का निमित्त बनता है। माया के कारण व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति से दूर होता जाता है और जीवन में दुख तथा पीड़ा की स्थितियां बढ़ती जाती हैं।

मुनिश्री ने कहा कि माया ध्यान व्यक्ति को अध्यात्म के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने देता। इसके प्रभाव में ज्ञान रूपी पर्वत भी ध्वस्त हो जाता है। माया मनुष्य की कामवासना को प्रज्वलित करती है और उसके भीतर अशांति को बढ़ाती है।

मुनिश्री ने कहा कि मन की शांति को खोने वाला कषाय ही माया है। जहां माया ध्यान का सेवन होता है, वहां दुख, दुर्गति और पीड़ा की परंपरा चलती रहती है। इसलिए व्यक्ति को सूक्ष्मता से अपने भीतर झांककर यह समझना होगा कि माया ध्यान की जड़ कितनी गहरी है। इससे बचने और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Ramesh Pandey

Ramesh Pandey

मेरा नाम रमेश पाण्डेय है। पत्रकारिता मेरा मिशन भी है और प्रोफेशन भी। सत्य और तथ्य पर आधारित सही खबरें आप तक पहुंचाना मेरा कर्तव्य है। आप हमारी खबरों को पढ़ें और सुझाव भी दें।

For Feedback - ask.mrjnews.in@gmail.com

Leave a Comment